टेराकोटा , गोरखपुर
                
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टेराकोटा या मिटटी की कला, एक ऐसी कृति है जो कि मिटटी से बनी तथा पकाने पर चमक रहित होती है व सामान्यत: लाल रंग की होती है। यह कुम्हार के चाक की गति का उत्पादक कार्यो में प्रयोग करने की भाति मानव सभ्यता का षिल्पकारी की दिषा में पहला कदम है। कुम्हारी कला तो सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से विधमान है और इस सभ्यता के एक स्थल मेहरगढ से इसके चिन्ह भी मिले है।मिटटी या टेराकोटा की बनी हुर्इ ऐसी अनेक लघु मूर्तिया वहा के अवषेषो में मिली है जिसमें गाय, कुत्ता, भालू, बन्दर आदि को गढा गया है। टेराकोटा का प्रयोग मूर्तिकला के इतिहास में कुम्हारी कला में र्इट बनाने एवं खपरैल बनाने में सदैव से होता आया है।
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टेराकोटा के बारे में
टेराकोटा या मिटटी की कला, एक ऐसी कृति है जो कि मिटटी से बनी तथा पकाने पर चमक रहित होती है व सामान्यत: लाल रंग की होती है। यह कुम्हार के चाक की गति का उत्पादक कार्यो में प्रयोग करने की भाति मानव सभ्यता का षिल्पकारी की दिषा में पहला कदम है। कुम्हारी कला तो सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से विधमान है और इस सभ्यता के एक स्थल मेहरगढ से इसके चिन्ह भी मिले है।
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मिटटी कला का इतिहास
माना जाता है कि ''सरामिक नाम ग्रीक शब्द ''केरामिक से लिया गया है, जिसे मिटटी के पात्र बनाने की कला कहते हैं। आज कि उन सभी प्रयोग में आने वाली कृतियों को सिरामिक कहते हैं जिन्हें आग द्वारा पकाया जाता है। जर्मनी और फ्रांसीसी भाषा में ऐसी कृतियों को ''केरामिक और ''सिरामिक कहा जाता है।
पात्र बनाने की कला सबसे पुरानी है। इस कला की क्रमवार प्रगति को जानना बहुत मुशिकल है।
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पत्थरनुमा पात्र
यह शीशे जैसे पारदर्शी पात्र सफेद या रंगीन मिटटी से बने होते है। सफेद पात्रों को अधिकतर पोरसलीन के लेप द्वारा चमक दी जाती है परन्तु रंगीन पात्रों को चमकाने के लिए नमक का प्रयोग किया जाता है। यह पात्र आमतौर पर चूना मिटटी फायर क्ले से बनाये जाते हैं
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माटी का टेराकोटा रूप
भारत यूँ तो विविध कलाओं के माध्यम से विश्व में अपनी अद्वितीय पहचान बनाये हुए है, पर गोरखपुर (उ0प्र0) के उत्तर में बसे ग्राम औरंगाबाद के टेराकोटा (मिटटी के बर्तन, खिलौने व कलाकृतियाँ) की धूम देश ही नहीं, विदेशों में भी है।यहाँ के शिलिपयों की उंगलियाँ जब चाक पर चढ़ी मिटटी के लोंदे से खेलती है
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महत्वपूर्ण सूचना
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